खाली किताब
पढ़ रही हूँज़िन्दगी की किताबआहिस्ता -आहिस्तावर्क दर वर्कपन्ना दर पन्नालफ्ज़ बा लफ्ज़फिर इस केएक -एकहर्फ को उतारूँअपने जलते हुए सीने मेंऔर इस तरह बीता दूँअपनी लम्बी ज़िन्दगी कीतन्हा रात ..वर्ना यह अँधेरेमुझे अपने में समेट करखाली किताब सा कर देंगे !!!रंजना...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[10 May 2010 06:46 AM]



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