मैं लाकर गुल बिछाता हूं
तुझे दिल याद करता है तो नग़्मे गुनगुनाता हूँजुदाई के पलों की मुश्किलों को यूं घटाता हूंजिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद मेंहवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूंफसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसलेहटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल...
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नीरज गोस्वामी
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[10 May 2010 00:35 AM]



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