तेरा चूल्हा चाँद पका कर रखता मेरी थाली पर ।

naturica सिर रख के तुम्हारी गोद में आज अगर रो पाते माँ।तुम हाथ फेरती बालों पर तो शायद सो पाते माँ॥तेरा चूल्हा चाँद पका कर रखता मेरी थाली पर ।रात तवे सी अब काली है नहीं चाँद को पाते माँ॥दुनियां की इस लूट-मार में अपना हिस्सा हार गए।क़तरा भर की प्यास हमें थी हम भी... [पूरी पोस्ट]
writer Deepak Tiruwa

ग़ज़ल

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[10 May 2010 00:01 AM]

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