त्रिवेणी ग़ज़ल

naturica फिर कोई खलिश मुझे, जागती है रात भर ।तीरगी* में रास्ता, ढ़ूंढ़ती है रात भर ।तमन्ना दीवारो - दर , पीटती है रात भर॥ज़ख्म से बहता हुआ , खून क्यों खामोश हो ।आरज़ू दिल की बहुत , बोलती है रात भर ।हर तरफ खला में पर तौलती है रात ॥ये फितूर है मेरे , तालि - ए - बेदार**... [पूरी पोस्ट]
writer Deepak Tiruwa
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[09 May 2010 22:30 PM]

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