लौट आये स्वर अधर के
बन्द द्वारे से पलट कर लौट आये स्वर अधर केदॄष्टि के आकाश पर आकर घिरीं काली घटायेंथाम कर बैठे प्रतीक्षा को घने अवरोध आकरलीलने विधु लग गया है आज अपनी ही विभायेंकिन्तु मैं दीपक जला कर आस की परछाईयों मेंअधलिखी कोई रुबाई गुनगुनाता जा रहा हूँधुल गये अक्षर ह्रदय...
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राकेश खंडेलवाल
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[09 May 2010 21:59 PM]



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