बुक्का फूटा..बुक्क!!!
हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं. काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते. दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है? दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं....
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Udan Tashtari
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[09 May 2010 21:00 PM]



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