मनुष्य के वाक् और मस्तिष्क का विकास

अनवरत परन्तु हाथ अपने आप में ही अस्तित्वमान न था। वह तो एक पूरी अति जटिल शरीर-व्यवस्था का एक अंग मात्र था। और जिस चीज से हाथ लाभान्वित हुआ, उस से वह पूरा शरीर भी लाभान्वित हुआ जिस की हाथ खिदमत करता था। यह दो प्रकार से हुआ।पहली बात यह कि शरीर उस नियम के परिणाम... [पूरी पोस्ट]
writer दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
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[09 May 2010 15:55 PM]

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