देश और संसद को जाति की जरूरत!

चिट्ठानामा गरीब की दुश्मन जाति अमीरsansadji.comजाति की जरूरत ने अचानक संसद को इतना बेचैन क्यों कर दिया है? लोकतंत्र के पहरुओं ने जाति का जहर बुझाने की बजाय उसकी लौ जलाए रखने पर अपना जोर एक बार फिर केंद्रित कर लिया है। एक बार फिर वे काले अध्याय लिखने में मशगूल दिखते... [पूरी पोस्ट]
writer मुंहफट

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[09 May 2010 03:05 AM]

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