मां के लिए.....

मैं तो जी चुप ही रहता हूं ! कितनी बार माँ मैंने देखा है तुमको संकोच में,कब किससे, कहूँ, क्या, कब, कैसे, की सोच में,अपने ही घर की बैठक में गुमसुम तुम,परोस रही चाय-पकौड़ी अंग्रेजी मेज पर,और खाली प्यालों में खोजती हस्ती अपनी,जो बेजुबान हो गयी है अपने ही देश मेंऔर कितनी ही बार माँ, बचपन... [पूरी पोस्ट]
writer alok ranjan

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[08 May 2010 23:19 PM]

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