माँ के चरणों में
विश्वासों के दीप जला कर भरे प्राण में सघन चेतनाबने सुरक्षा कवच, पंथ में हरने को हर एक वेदनामिट्टी के अनगढ़ लौंदे से प्रतिमा सुन्दर एक संवारेसंस्कृतियों के अमृत जल से बने शिल्प को और निखारेचारों मुख से सृष्टि रचयिता ने किसकी महिमा गाई थीतन पुलकित मन...
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राकेश खंडेलवाल
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[08 May 2010 22:08 PM]



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