बासी फूल
मैं पतझड़ का बासी फूल ! चढ़ न सकूँगी देव मूर्ति पर, मिटना होगा बन कर धूल ! मैं पतझड़ का बासी फूल ! प्रिय के युगल चरण साकार, सह न सकेंगे मेरा भार,सौरभ हीन शून्य जीवन मम, इसे सजाना है बेकार,कान्त कल्पना प्रिय चरणों पर चढ़ने की, थी मेरी भूल ! मैं पतझड़ का बासी...
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Sadhana Vaid
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[08 May 2010 21:44 PM]



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