जॉर्ज इवानोविच गुरजिएफ़
“हमारी प्रथाएं या संस्कार तभी तक मूल्यवान है जब उन्हें उनके मूल शुद्ध रूप में क्रियान्वित किया जाये. ये ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें अथाह सन्देश छिपे हैं. उन्हें समझ सकनेवाले ही उन्हें पढ़ सकते हैं. प्रत्येक संस्कार अपने आपमें सैंकड़ों किताबों और कथाओं...
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Nishant
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[08 May 2010 21:30 PM]



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