मंज़िल तक
सुबह हो गयी है. उठने और चल पड़ने का वक्त आ गया है, पर कहाँ, किसलिए औए क्यों? इन्हीं सवालों की छानबीन करते कुछ शब्द------ जो लीक पर चलते हैं
वे पहुँचते हैं
दूसरों द्वारा तलाशी
गयी मंज़िल तक वे सिर्फ़ चलना जानते हैं
अनुकरण करना उनकी अपनी
कोई मंज़िल नहीं होती...
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डा.सुभाष राय
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[08 May 2010 19:30 PM]



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