अनुजवधू, भगिनी, सुतनारी। सुनु सठ, कन्या, सम ये चारी।।

ऋषभ उवाच मित्रो!तुलसीबाबा कथा के क्रम में तनिक सा अवसर मिलते ही अपने वांछित समाज के आचार के संकेत बड़ी कुशलता से देते हैं। लोग प्राय: बालि-वध के औचित्य-अनौचित्य पर लंबी-लंबी बहस करते रहते हैं। बहस को एक ओर खिसकाकर अगर देखें तो पता चलता है कि इस अवसर का लाभ उठाकर... [पूरी पोस्ट]
writer ऋषभ Rishabha
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[08 May 2010 17:43 PM]

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