अनपढ़ और जाहिल है मेरी माँ
अनपढ़ और जाहिल है मेरी माँ ज़माने भर की नज़रों को पढ़ा उसने सबसे बचा के मुझको, हीरे सा गढ़ा उसने जब मुझको गाड़ी, बँगला और ओहदा मिला जिन्दगी में एक हसीं सा तोहफा मिला पूछा उस हसीं ने कितना पढ़ी है माँ? तो मुंह से निकल गया बिलकुल अनपढ़ है मेरी माँ भरी जवानी...
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शेफाली पाण्डे
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[08 May 2010 11:13 AM]



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