मां होती है एक सी......
परिंदों की अठखेलियांबंदनवार बनाता उनका कलरवसिंदूरी शाम में लौटता झुंडदिवसावसान में घर की तड़पऔर घरौंदे में इंतजार करता कोईजो मुझे ज़िंदगी से भर जाता हैएक मूक पंछीजो मौन में रिश्तों को जीता हैमैने देखा है वो रिश्ता है 'मां' दर्द की सिहरन में मरहम है...
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ज्योति सिंह
मां तुमसा कोई नहीं
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[08 May 2010 09:31 AM]



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