सन्तों के चरण छूते हुए चिकोटी काटने का मन हो रहा है....कहीं आप का भी मन लहक रहा हो
जहँ जहँ चरण पड़े सन्तन के, तहँ तहँ बंटाढार……यह बात मेरे गाँव के पोखरे के लिए सटीक बैठती है। ठीक दो साल पहले के ये तीन चित्र हैं और ठीक दो साल बाद के ही सूखे पोखर वाले चित्र है…..नरेगा का भरपूर उपयोग हुआ है…..पैसा पानी की तरह बहा...
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सतीश पंचम
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[08 May 2010 07:01 AM]



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