त्यागो शूद्रा भूमि
शूद्रा भूमि उसे कहें , काला होवे रंग | कड़वा-कड़वा स्वाद दे , देवे मदिरा-गंध ।। देवे मदिरा-गंध, ठीक-ठाक रहते योग | लोन लेलो भैया, लगालो एक उद्योग || कह `वाणी´ कविराज , फिर भी बात नहीं जमी । बनाय वहाँ श्मशान, त्यागो तुम शूद्रा भूमि || शब्दार्थ : मदिरा गंध =...
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[08 May 2010 06:20 AM]



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