चलिए कुछ ऐसी तरन्नुम गुनगुनायी जाये ----- अमित शर्मा
चलिए कुछ ऐसी तरन्नुम गुनगुनायी जायेदीवारे भरम की सारी जड़ों से गिराई जायेउकताहट बहुत होती है ज़माने की गर्मी सेठंडाई मुहब्बत की ज़माने को पिलाई जायेजगमगाते मस्जिद -ओ- मंदिर क्या रोशन...
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Amit Sharma
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[08 May 2010 05:45 AM]



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