वही मौसम - वही मंज़र
कभी इकरार चुटकी में, कभी इंकार चुटकी में,मरासिम का किया कुछ इस तरह इज़हार चुटकी में।वही मौसम, वही मंज़र,वही मैकश, वही साकी,हुई है आज फिर मेरी, कसम बेकार चुटकी मे।कभी वो प्याज़ के आंसू, कहीं पे अल्पमत होना,बदलती है हमारे देश की सरकार चुटकी मे।मेरा ये देश...
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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[08 May 2010 04:56 AM]



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