होंट चाहें और साग़र हैं मिलें

सुराही होंट चाहें और साग़र हैं मिलेंरूह प्यासी और पैकर हैं मिलेंना उछल, ऐ मौज, चंदा देखकरआसमाँसे कब समंदर हैं मिलेंमिन्नतें की, गिडगिडाए, तब मिलेंखूब हमको आज़माकर हैं मिलेंइश्कमें तोहफ़ें मयस्सर हैं मिलेंनाज़, नखरें, और तेवर हैं मिलेंआजकल खिलने से भी डरता है... [पूरी पोस्ट]
writer मिलिंद / Milind

ग़ज़ल

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[08 May 2010 03:26 AM]

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