जिंदगी जिधर ले जाए...
ये जिंदगी किसे बहाकर कहाँ ले जाय , ये कोई नहीं जानता है. इसी तरह दौड़ती भागती दुनिया में तमाम तरह की चीजों से टकराते हुए मैं आखिर देश की राजधानी में अपना ठौर ढूंढता हुआ आ ही गया. जिंदगी ने मुझे अभी तक उतनी खुशियाँ नहीं दी है या यूं कहे कि इच्छाए कभी मरती...
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डॉ. अजीत कुमार
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[08 May 2010 03:21 AM]



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