इतना भी न इतराओ ....
इतना भी न इतराओ...कई नदियों को हमने बहते देखा हैखेत खलिहानों को मिटते देखा हैकई साहिल को बनते-बिगड़ते देखा हैमेरे दोस्त यह ठीक है किनदियां जब चलती है अल्हड़ होती हैकई मोड़ पर इठलाती बल खाती हैंसफर में इसके नये निशां बनते हैंदोस्त हमने...
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boletobindas
ये जो लाइफ है ......कविता
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[07 May 2010 18:33 PM]



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