आजादी

रतन चंद 'रत्नेश' बाप–बेटे शहर के चौराहे पर खड़े थे। सामने से एक मौन जुलूस जा रहा था, हाथ में बैनर–पोस्टर थामे।भावशून्य पिता जुलूस के गुजरने की प्रतीक्षा कर रहा था, पर पाँच वर्ष के अबोध बच्चे के बालसुलभ मन में पश्न कुलबुलाने लगे थे। उसने उत्सुकता से पूछा––‘‘पापा, ये लोग... [पूरी पोस्ट]
writer रतन चंद रत्नेश

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[07 May 2010 14:25 PM]

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