अचक्के
रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब जाया होता दीखूंगा, अपने शरम में मुंह चुराता, इस गली उस सड़क यूं ही आता-जाता फिर देखोगे एक दिन अचक्के में ही मिलूंगा कभी जैसे खुद को भी तुम पाओगे ऐसे ही कभी गोपन क्षणों अप्रत्याशित, अचकचाये हुए धीमे स्वयं के करीब आते, दुलराते...
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Pramod Singh
मन की गांठ
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[07 May 2010 11:59 AM]



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