बैंगन पर दोहे: संजीव वर्मा 'सलिल'
'बैंगन' हूँ बेगुन नहीं, मुझे बनाओ मीत. 'भटा' या कि 'भांटा' कहो, नहीं घटेगी प्रीत.. आलू मेरा यार है, मन भायी है सेम. साथ हमारा अनूठा, जैसे साहब-मेम.. काला नीला बैगनी, भाता रंग सफ़ेद. हिलमिल रहता सभी संग, यही खुशी का...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
acharya sanjiv 'salil'
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[07 May 2010 10:39 AM]



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