कविता: नानी का आंगन - शाहनवाज़ सिद्दीकी
नानी का आंगनवो नानी का आंगन, वो बातें बनाना,कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो 'हाथ के पंखे' की बात अलग थी,अजब था सूकूँ, वो बहार अलग थी,वो नानी का पंखा हिला के सुलाना।कहां भूल पाता हूँ गुज़रा ज़माना।वो सावन का मौसम, बहारो का मौसम,वो मेंढक पकड़ना, वो...
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Shah Nawaz
Hindi poem
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[07 May 2010 02:49 AM]



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