तुम आने वाले हों शायद
बहुत दिनों से आलोक उपाध्याय "नज़र" साहब को पढने का मौका नहीं मिल पा रहा था, आज इक नई रचना के साथ हमारे बीच में आइये लुत्फ़ लें- कुछ उजला कुछ धुंधला सा है दिल का मौसम बदला सा है जब उलझे तब तब समझे जीवन एक मसला सा है तेरी मेरी हालत एक तरह लोग कहें तू पगला सा...
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नई कलम - उभरते हस्ताक्षर
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[07 May 2010 01:56 AM]



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