लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।

खुली खिड़की गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते... [पूरी पोस्ट]
writer Kulwant Happy

मैं

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[06 May 2010 23:47 PM]

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