एक लम्हे के बाद

हथकढ़ कुम्हार के चाक सी नहीं होती है ज़िन्दगी कि सब कुछ उपयोगी और सुन्दर बनाते हुए ठीक वहीं आकर चक्का रुक जाये जहाँ से शुरू हुआ था. इससे से तो हर पल कुछ छीजता जाता है, किसी अल्पव्यय हानि की तरह जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होती. मैं सुबह घर से निकला हुआ शाम होते... [पूरी पोस्ट]
writer hathkadh
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[01 Apr 2010 02:15 AM]

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