गुजरा वक़्त कान के पास आ कर बोलता है...
###पहाड़ों के नीचे की खाई झील बन गयी थीखारे पानी कीपर आँखों का बरसना नहीं रुका थारुका तो वो भी नहीं था...चला गया था आँखों से निकल करजाने किसकी फिक्र थी और कैसी जिद,पीछे छोड़ गया थापहाड़ पे बैठी आँखेंगुजरा वक़्तबिना बोले नहीं मानता,बिल्कुल कान के पास आ कर...
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ओम आर्य
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[06 May 2010 22:38 PM]



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