रौशनी कर

Jogeshwar Garg रौशनी कर घर जला कर बोल हंस कर ग़म भुला कर जीतते ही मैं सिकंदर  हार मेरी शहर के सर  बूँद हूँ मैं तू समंदर  छोड़ कल की आज ही कर उम्र गुजरी राह चल करदोस्त सब खुश ज़ख्म दे कर  शिव बने शिव ज़हर पी... [पूरी पोस्ट]
writer jogeshwar garg

ghazal

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[06 May 2010 13:49 PM]

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