प्रेम की सुन्दरता का निषेध करने वाले इसी तट आते हैं हाथ - पैर धोने

कबाड़खाना अख़बार , टीवी , इंटरनेट से गुजरते हुए पिछले कुछ दिनों से वीरेन जी की यह छोटी - सी कविता बार - बार याद रही है.....याद क्या आ रही है परेशान -सी किए हुए है...आइए देखते - पढ़ते हैं....विद्वेष / वीरेन डंगवालयह बूचड़खाने की नाली हैइसी से होकर आते हैं नदी के जल... [पूरी पोस्ट]
writer sidheshwer
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[06 May 2010 13:12 PM]

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