जनाब "सरवर" की एक ग़ज़ल : वो तसव्वुर में ...

उर्दू से हिंदी वो तसव्वुर में भी मुझ पर मेहरबां होता नहीं रब्त आख़िर क्यों हमारे दरमियां होता नहीं ? दिल पे जो गुज़रे है नज़रों से अयां होता नहीं हाये क्या कीजिए कि क़िस्सा ये बयां होता नहीं आशिक़ी में मातम-ए-आशुफ़्तगां होता नहीं ? आप ही कह दें कि ऐसा कब कहाँ होता नहीं? दिल... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[06 May 2010 10:33 AM]

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