नारी
नारी सौंदर्य भरा अनंत अथाह,इस सागर की कोई न थाह .कैसे नापूँ इसकी गहनता,अंतस बहता अनंत प्रवाह .ज्योति प्रभा से उर आप्लावित,प्राण सहज करुणा से द्रावित .अंतर्मन की गहराई में,प्रेम जड़ें पल्लव विस्तारितसरल हृदय संपूर्ण समर्पित,कण- कण अंतस करती अर्पित .रोम -...
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Kavi Kulwant
नारी
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[06 May 2010 04:53 AM]



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