धुएँ का पहाड़

safar ke sajde mein आदमी कुछ भी नहींहसरतों के सिवाधुएँ का पहाड़उठता हैक्या जाने किधर से आता हैचिँगारी दिखाने की देर हैलपटों से घिरा नजर आता हैकभी बेड़ियाँ , कभी पायलऔर ख़्वाबों की सैर-गाहकभी गुबार औरलपटों से झुलस जाता हैआदमी कुछ भी नहींचिँगारी , गुबार और लपटेंधुएँ का खेल... [पूरी पोस्ट]
writer शारदा अरोरा
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[06 May 2010 04:43 AM]

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