चाँद को बख्श दो

कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में सुन सुन के आशिकी के तरानेपक गया है चाँद को बख्श दो वो थक गया है शक्ल जब अपने यार की चाँद से मिलाते है आसमान में चाँद मियादेख देख झल्लाते है अपनी सूरत पहचानने में दम उनका चुक गया है चाँद को बख्श दो वो थक गया है बे- बात की बात सारी रात किया करते है... [पूरी पोस्ट]
writer Sonal Rastogi

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[06 May 2010 02:25 AM]

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