ग़म में हंसने वालो को कभी रुलाया नहीं जाता!
कहाँ रोज रोज मिलती है वजह यूँ इस तरह पास हमारे आने की,कुछ देर और ठहरो कि आँखों ने इजाजत नहीं दी है अभी जाने की क्या जरूरत है शर्म-ओ-हया को, लबों पर इस तरह पहरा बिठाने की,ग़र आँखों की जुबां समझो तो बात नहीं कुछ और तुम्हें बताने की कैद कर लेंगे इन आँखों...
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Neeraj
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[05 May 2010 18:28 PM]



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