कविता -घोड़ा
Shareमेरा दो बरस का भांजा शिवांश मुझे घोड़ा समझता हैटिक्-टिक् कहता हैमेरी पीठ पर बैठ करपक्के यकीन के साथकि मैं घोड़ा ही हूंमैं भी घुटने-हाथों केाटेक देता हूं ज़मीन परथोपी और ओढ़ी हुईपहचान से मुक्त होकरहो जाता हूं शामिलउसके इस यकीन मेंकि मैं घोड़ा ही हूंघुटने...
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माणिक
कविता
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[05 May 2010 12:56 PM]



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