माँ की चाह : ह्रदय छू लेने वाली एक मर्मस्पर्शी कविता - हर माँ को समर्पित
आज फिर वही स्वप्न आया , खुद को कुछ सुनता हुआ पाया ,माँ ने बहुत कुछ कहना चाहा , पर मैं पत्थर बन खड़ा रहा ,नींद खुली तो कुछ समझ आया ,माँ को नहीं बस खुद को पाया ,दोपहर की पहली डाक से माँ की बिमारी का तार आया ।अब तक खुद को समझाता रहा ,पर आज कोई बहाना ढूंढ़ ना...
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राजेन्द्र मीणा 'नटखट'
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[05 May 2010 12:29 PM]



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