मौसम 5 मई
दूर बहुत दूरधरती के सुदूर कोनों में बसेज़रा -ज़रा पहचाने लोग,उनकेमृतप्राय रिश्तों में उठाहल्का सा स्पंदन…रोप गया मेरे मन की रुठी मिट्टी मेंउम्मीद का नन्हा हरियाला बिरवा …यहाँआस-पास नहींन सहीमै खुश हूँ कहीं तो मौन पे बौछारे हैंथमे हुए संवादों में बीजकहीं...
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पारूल
मेरे फ़ितूर
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[05 May 2010 09:45 AM]



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