सरों से ऊँची फ़सीलें हैं क्या नज़र आये
सरों से ऊँची फ़सीलें हैं क्या नज़र आये।कहाँ से आती ये चीख़ें हैं क्या नज़र आये॥उमीदो-बीम के जंगल में हूँ घिरा हुआ मैं,तमाम शाख़ें-ही-शाख़ें हैं क्या नज़र आये॥वो पहले जैसी बसीरत कहाँ इन आंखों में,बहोत ही धुंधली सी शक्लें हैं क्या नज़र आये॥तअल्लुक़ात कई...
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युग-विमर्श
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[05 May 2010 08:13 AM]



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