वक्त का यूं मनमानी करना भी भला लगता है.....

kuch ehsaas मैं अक्सर सोचती हूँ.....कई बार वक्त गुज़र कर भी क्यों नहीं गुज़रता....ढीट बनकर खड़ा रहता है! और कैसे कहे कोई इसे चले जाने को! वक्त से तकरार करना जैसे खुद को ही पराजित करना है! कई बार सोचती हूँ..मैं इस नामुराद के मुंह लगती ही क्यों हूँ मगर यादों का पुलिंदा... [पूरी पोस्ट]
writer pallavi trivedi
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[05 May 2010 03:17 AM]

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