जीने का शऊर आ रहा है....?

अस्तित्व झिलमिलाते तारों और खिलखिलाती हवा के साथ रात की जुगलबंदी के माहौल में अपनी साधना के पन्नों को पलटते हुए बहुत सारी शहद की बूँदे जहन में उतरी थी.... सोचा था, सुबह बहुत मीठी होगी...। जागने से पहले और नींद के लंबे दौर के बाद जब आँखें खुली तो पता नहीं क्यों... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. अमिता नीरव
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[05 May 2010 02:35 AM]

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