ये चाँद जो उजला दिखता है
ये चाँद जो उजला दिखता हैबस तेरी नज़र का धोखा है है सारी उमर बहता रहता आँखों में कहीं इक दरिया हैपहचान इन्हें कैसे होगी हर आँख चढ़ा इक चश्मा हैतू देख के दाना चुगना रे ! वो जाल बिछाए बैठा हैहर रात बिताता आँखों मेंयह शहर भी मुझ सा तनहा हैजीने की उसे है चाह...
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प्रताप नारायण सिंह
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[05 May 2010 00:26 AM]



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