श्रोतानुराग
कब बीता कविता का वितान ना तृप्त हुए मन और कान.था कैसा कविता का विमौनमैं देख रहा चुपचाप कौन आया उर में श्रोतानुराग जो छीन रहा मेरा विराग करपाश बाँध रंजित विशाल भावों का करता है शृंगार तुर चीर अमा का अन्धकार लाया उर में जो...
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Pratul
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[04 May 2010 10:18 AM]



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