'धरा तुम भी ख़ूब हो' (पुनः प्रकाशित )
अपनी धुरी पे घूमती,प्रचंड अग्नि चूमती, अनादि काल से अनंत, अंतरिक्ष तोलती, कर्त्तव्य से जुड़ी सदा, युगों-युगों से डोलती, सृष्टि के नए-नए,रहस्यों को खोलती धरा तुम भी ख़ूब हो, कभी भी कुछ न बोलती, धरा तुम भी ख़ूब हो, कभी भी कुछ न मांगती, तुमने बदलते...
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Yogesh Sharma
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[04 May 2010 09:58 AM]



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