क्‍या उनकी उमर थी हमें छोडकर जाने की .. पर अच्‍छे लोग तो यूं ही चले जाया करते हैं !!

गत्‍यात्‍मक चिंतन दोपहर से कांप रहा है बदन .. न कुछ खाने और न ही कुछ कर पाने की हिम्‍मत है .. मन हल्‍का करने के लिए कभी भाई बहनों को फोन करती हूं .. और कभी दोस्‍तो को ..  फिर भी मन हल्‍का होने का नाम ही नहीं ले रहा .. इंटरनेट भी खोला  तो शब्‍द ही पढे नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer संगीता पुरी
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[04 May 2010 09:23 AM]

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