chand
कभी बोझिल सेमाथे पेलगी बतियाती बिंदी...कभी मछली कीआँखों से छलकतीरौशनी...कभी किसी सांपकी मणी...कभी फूलों के बीचभीगी सी खुशबु...कभी बच्ची के हाथोमें फड़कती जिंदगी...कभी मोतीसा खुद ही मेंपूरा....हर रात जहाँ की हरशय अर्श परयूँ ही बादलोसे बनतीबिगड़ती रहती...
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aanch
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[04 May 2010 08:01 AM]



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