दुखी मुसाफिर फिर रहे बेचारे-बेचैन

तीखी नज़र दो दिन से हड़ताल पर बैठे मोटरमैनदुखी मुसाफिर फिर रहे बेचारे-बेचैन बेचारे-बेचैन, किस तरह दफ्तर जायेंकोई सरल उपाय नहीं चव्हाण बतायेंदिव्यदृष्टि पीटते 'मराठी-मानुष' छातीकिंतु न कोई हमदर्दी ममता जतलातीं... [पूरी पोस्ट]
writer दिव्यदृष्टि
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[04 May 2010 06:26 AM]

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